प्रेम देना सबसे बड़ा उपहार और प्रेम पाना सबसे बड़ा सम्मान है –

 “प्रेम शब्द से न चिढ़ो। यह हो सकता है कि तुमने जो प्रेम समझा था वह प्रेम ही नहीं था। उससे ही तुम जले बैठे हो और यह भी मैं जानता हूँ कि दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीने लगता है। तुम्हें प्रेम शब्द सुनकर पीड़ा उठ आती होगी, चोट लग जाती होगी। तुम्हारे घाव हरे हो जाते होंगे। फिर से तुम्हारी अपनी पुरानी यादें उभर आती होंगी।
लेकिन मैं उस प्रेम की बात नहीं कर रहा हूँ। मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ उस प्रेम का तो तुम्हें अभी पता ही नहीं है, और मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ वह तो कभी असफल होता ही नहीं और मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ उसमें अगर कोई जल जाए तो निखरकर कुंदन बन जाता है, शुद्ध स्वर्ण हो जाता है।

मैं जिस प्रेम की बात कर रहा हूँ उसमें जलकर कोई जलता नहीं और जीवंत हो जाता है।

व्यर्थ जल जाता है, सार्थक निखर आता है।”
– ओशो