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अतिक्रमण

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ईश्वर ने दिया जिन्दगी परमार्थ के लिए
हमने प्रयुक्त किया इसे स्वार्थ के लिए,
यह सांस मिली हमको पर उपकार के लिए
हमने प्रयोग कर लिया तकरार के लिए ।

ये आसमां मिला हमें उड़ान के लिए
हमने प्रयोग किया युद्ध यान के लिए,
नदियां तो मिलीं हमको जलपान के लिए
हमने प्रयोग किया कूड़ेदान के लिए ।

ये धरती मिली हमको अवदान के लिए
हमने प्रयोग किया श्मशान के लिए,
जीवन ये मिला ईश के गुणगान के लिए
हमने प्रयोग किया दंभ ज्ञान के लिए ।

ईश्वर दयालु बहुत हैं इंसान के लिए
मानव तो कर्म कर रहा हैवान के लिए,
हमको मिला विवेक है उत्थान के लिए
जीना है हमें विश्व के कल्याण के लिए ।

पर दुखद है मर्यादा का अतिक्रमण हो रहा है
अभिशप्त होकर मानव निज स्वत्व खो रहा है,
सुख शांति से हो दूर वह विद्रूप हो रहा है
वह अपनी करनी के ही अनुरूप रो रहा है।

रुक जाए अतिक्रमण तो देवत्व का अवतरण हो
नित सत्य का उदय हो असत्य का शमन हो,
जीवन बने ये सार्थक उज्जवल  धवल गगन हो
हर आत्मा प्रफुल्लित हर आत्मा मगन हो ।

लेखक -
प्रो. बसंता
अध्यक्ष अंग्रेजी विभाग
सरदार वल्लभभाई पटेल महाविद्यालय, कैमूर, बिहार