क्या आप जानते हैं
कि आपके घर में पड़े पुराने अखबारों से एक ऐसी रंगीन और टिकाऊ कला बनती है जो भारत की सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ी है?
जी हाँ! हम बात कर
रहे हैं पेपर माशी (Papier Mâché) की – एक ऐसी हस्तशिल्प कला जो बेकार कागज को
खूबसूरत वस्तुओं में बदल देती है।
पेपर माशी क्या है और कैसे बनी अनोखी?
"Papier
Mâché" एक फ्रेंच शब्द है, जिसका मतलब है "चबाया हुआ
कागज"। लेकिन भारत में यह सिर्फ एक कागज की लुगदी नहीं, बल्कि हुनर, धैर्य और कल्पना की अद्भुत मिसाल है। पुराने अखबारों को
पानी में भिगोकर, मैदे या गोंद से मिलाकर जो लुगदी तैयार
होती है, उसी से बनते हैं सुंदर फूलदान, मुखौटे, जानवरों की आकृतियाँ, खिलौने, दीवार सजावट, और भी बहुत कुछ।
क्या आप जानते हैं कि पेपर माशी कश्मीर से जुड़ी है?
जी हाँ! पेपर माशी
को भारत में सबसे पहले कश्मीर में लाया गया था – लगभग 14वीं शताब्दी में। यहाँ के कारीगरों ने इस कला को स्थानीय
डिजाइनों और मुगल कला से जोड़कर एक अनोखा रूप दिया। कश्मीरी पेपर माशी की पहचान
उसके जटिल और सुनहरे डिजाइनों से होती है।
धीरे-धीरे यह कला उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में भी फैल गई, और हर क्षेत्र ने इसे अपनी शैली दी।
कैसे बनती है पेपर माशी की चीज़ें?
जानिए इसकी सरल 5-चरणीय विधि:
- कागज भिगोना: पुराने अखबार के टुकड़ों को रातभर
पानी में भिगोते हैं।
- लुगदी बनाना: भीगे कागज को मसलकर, गोंद या मैदे के साथ मिलाकर लुगदी
तैयार होती है।
- आकार देना: इसे साँचे में ढालकर या हाथ से
आकृति दी जाती है।
- सूखाना: कुछ दिन तक सूखाया जाता है ताकि यह
मजबूत हो जाए।
- रंगाई-सजावट: फिर उस पर सफेद कोट चढ़ाकर रंगीन डिज़ाइन, गोल्डन वर्क और पारंपरिक चित्रकारी की जाती है।
पेपर माशी पूरी
तरह से रिसायकल सामग्री पर आधारित होती है – यानी पुराने कागज से नई दुनिया रचना। इसीलिए यह प्लास्टिक के विकल्प के रूप
में एक बेहतरीन उदाहरण है।
आज कई युवा कलाकार
और स्टार्टअप इस कला को गिफ्ट आइटम्स, होम डेकोर और आर्ट प्रोजेक्ट्स में इस्तेमाल कर रहे हैं।
यह आत्मनिर्भर भारत से भी जुड़ी है?
पेपर माशी कम लागत
में सीखी जा सकने वाली कला है जो घरेलू उद्यमिता और स्वरोजगार के शानदार अवसर प्रदान करती है। गाँवों और शहरों में
महिलाएं इसे अपनाकर सशक्त बन रही हैं।
पेपर माशी सिर्फ
एक कला नहीं है —
यह एक विचार है कि
हम कैसे रद्दी को रचना में बदल सकते हैं,
कैसे अपनी संस्कृति को बचा सकते हैं,
और कैसे कला को
जीवन में जी सकते हैं।
तो अगली बार जब
आपके पास पुराना अखबार हो…
सोचिएगा — यह सिर्फ रद्दी नहीं, एक कला का बीज है!