गुरु पूर्णिमा पर गुरु को समर्पित कविता


आंखें खुली तो मां का आंचल पाया,
पाव धरा जब धरा पर तो पिता का सहारा पाया,
निकला जब घर से बाहर तो गुरु की छाया पाई।
गुरु की महिमा में क्या बोलूं मैं तो ओछा हो जाता हूं,
है भगवान से भी बढ़कर जो उस गुरु को मेरा प्रणाम।

सिखाया जिसने अंधकार से लड़ना वह महान, गुरु है।
हर समस्या का समाधान गुरु है।
धन्य हुआ मेरा जीवन पाकर गुरु की संगत को,
थे अनाथ बिन उसके इस जीवन में,
पुत्र से भी बढ़कर माना जिसने
वो महान,गुरु है।

घूम रहे थे अंधकार में गुरु से हमे प्रकाश मिला,
है जिसकी महिमा अपरम्पार ऐसे गुरु को मेरा प्रणाम।
बिना रूके बिना डरे आगे बढ़ना हमे सिखाया,
रास्ता बन कर खुद रुका वहीं मंजिल तक चलना हमे सिखाया।
है भगवान से भी बढ़कर जो उस गुरु को मेरा प्रणाम।।         


                लेखक - शिशिर यादव