कोरोना वायरस के प्रकोप से विश्व व्यवस्था व्यापक परिवर्तन के दौर से गुज़र रही है । इन परिवर्तनों की व्यापकता सामाजिक , आर्थिक , राजनैतिक , सांस्कृतिक क्षेत्रों के साथ ही मानव के व्यवहार में भी देखने को मिल रही है।महामारी के बाद की दुनिया एक जिज्ञासु होगी । न केवल एक सूक्ष्म स्तर पर व्यवहारिक , सामाजिक और राजनीतिक संशोधनों में वायरस प्रवेश करेगा और अमिट घरेलू परिवर्तनों को ट्रिगर करेगा , बल्कि यह देश - राज्यों को व्यापक स्तर पर प्रभावित करेगा । ऐसे समय में भारत विदेश नीति के सामने उपस्थित चुनौतियाँ - इंडो - पैसिफिक ओसियन में चीन की बढ़ती शक्ति , भावी विश्व में अप्रवासी संकट , भारत की पड़ोसी देशों ( विशेषकर पाकिस्तान और नेपाल ) के साथ निपटने की क्षमता की निरंतर विफलता , घरेलू नीति और विदेश नीति में अंतर्विरोध , अमेरिका - चीन व्यवस्था भारत के लिए अवसर ओर चुनौती दोनों , बहुपक्षीयवाद की विफलता , विदेशी निवेश को आकर्षित करने में कठिनाई तथा अर्थव्यवस्था की खस्ता हालात । महामारी के बाद के विश्व व्यवस्था में भारत की जो भूमिका है , वह इस बात से तय होगी कि हम अब संकट से कैसे निपटते हैं , और हम इससे कैसे निकलते हैं । यह , बदले में , कुछ बुनियादी कारकों पर निर्भर करता है - नेतृत्व की गुणवत्ता , सभी स्तरों पर प्रशासन की गुणवत्ता , ( केंद्र , राज्य , जिला और गाँव ) , संस्थागत ढाँचों की मजबूती , स्वास्थ्य देखभाल की गुणवत्ता और हमारी सामाजिक सुसंगतता लोगों के रूप में।एक नेतृत्व की भूमिका में यह तथ्य कि सीओवीआईडी -19 संकट का कोई अंत नहीं है , हमें इस बात का पूर्वाभास करने से नहीं रोकता है कि COVID - 19 दुनिया कैसी दिख सकती है । महामारी ने राष्ट्रवादियों और विश्व - विरोधियों से लेकर रणनीतिक सहयोग के पूरे स्पेक्ट्रम में विदेशी नीति विश्लेषकों के तर्कों को जोड़ दिया है , ताकि अंतर्राष्ट्रीय सहयोग जुटाने में भारत के लिए अधिक मजबूत बहुपक्षवाद और नेतृत्वकारी भूमिका की वकालत की जा सके ।

अनुराग शुक्ल
राजनीति विज्ञान, बीएचयू