Image Source : Google

अभी कुछ दिन पहले की ही तो बात है जब उसके रिश्तेदार अपने घर जा रहे थे , दिल्ली घूमने के बाद सब अपने घर वापस जा रहे थे, शुक्रवार का दिन था , इसी समय दिल्ली में भी चाइना से आया वाइरस लोगो में घर कर रहा था और कई कई जाने देखते देखते चली जा रही थी,
उसके घर वालों ने बहुत कहा भई घर आजा, छोड़ नौकरी कि मोह माया लेकिन बेचारे क्या करते करियर भी तो देखना था, डर था कहीं काम ना छूट जाए....... उन्हें क्या मालूम कि कैफियत इतनी बिगड़ जाएगी कि सब अपने अपने घर और कमरों मै लाक दाउन् ही हो जाएंगे , और ऐसा कि बिल्कुल भी बाहर निकालने को तरस जाएगी पूरी दिल्ली, दिल्ली क्या भारत, पाकिस्तान, इटली चीन,फ्रांस, अमेरिका दुनिया के तमाम देशों में लोग अपने अपने घरों मै बैठे थे मानो जैसे जेल में हो फर्क बस इतना कि वहा पुलिस मौजूद न थी , अब तो बस घर वालो की सूरत वीडियो कॉल में देख कर खुद को तसल्ली से देते और शुरू कर देते लड़ाई इस वाइरस के साथ, उनका भी तो योगदान था देश के लिए की वो अपने घर में बैठे और देश सेवा में योगदान दें.
समय रहते घर नहीं गए क्युकी परिवार के प्रति सेवा का भाव था और मुआमले बड़ जाने पर घर जाना , सफर करना देश के साथ परिवार के साथ गद्दारी सा लगा,
अब क्या अब तो ज़हन में हर बखत डर ही था,  कभी ये कर्फ्यू तो कभी खाने का सामान खत्म हो जाने का डर, और सबसे बड़ा डर "डर नहीं दहशत" उस वाइरस का जो पिछले कई दिनों से कई देशों के लोगों की जान लिए जा रहा था,
दिल्ली और तमाम शहरों में इसी तरह हजारों लाखो लोग अपने परिवार से दूर एकांतवास कि ज़िन्दगी बीता रहे थे,
ऐसा जान पड़ता था कि जीवन यही खत्म है पर कभी कभी लगता कि नहीं अभी तो बहुत है ये निष्ठुर ज़िन्दगी,
मंदिर, मस्जिद , चर्च सब बंद हा हस्पताल खुले थे उधर कई लोग जिनमें डाक्टर पुलिस पत्रकार और तमाम लोग थे जो अपनी जान की परवाह किए बगैर खुले सड़क पर अपनी जिम्मेदारियां निभा रहे थे, एक दिन जब देश के प्रधानमंत्री ने ऐलान किया कि रविवार शाम 5 बजे सब लोग देश के कोने कोने से अपने छत और बलकनियो से उन सभी को धन्यवाद दे जो अपना सब कुछ छोड़ सड़कों पर लोगो की हिफाज़त की खातिर लगे हैं,
वो समा बहुत भावनात्मक था जब लोग ऐसा कर रहे थे चारों तरफ तालियों की आवाज़,  पर कुछ लोगो की लापरवाही ने बीमारी को बढ़ा दिया ,
हुकूमत का नया पैग़ाम आया कि अगले 21 दिन तक पूरा भारत बंद रहेगा,
ये जान कर घर बैठे वो लोग जिनके घर वाले बाहर रह रहे है बेहद परेशान हो गए,
अब रह रह कर वो शुक्रवार का दिन याद रहा है जब घर वाले बार बार कह रहे थे घर आ जाओ, काश हम भी घर होते बहुत याद आता है घर बहुत याद आता है गाव कि गालियां वो रास्ते वो घर, सब बहुत याद आता है,
जब सब कुछ ठीक हो जाएगा सब एक बार अपने घर जाएंगे , फिर से पहले वाली बात हो  जाएगी, यदि मै अपनी बात करू तो बहुत याद आते है वो लोग जिनसे हम बेइंतेहा मोहम्मद करते है,
लेकिन ये जंग लड़ना जरूरी है
फिर आयेगा वो दिन जब हम बैठेंगे मुस्कुराते हुए आंखो पर चश्मा और सर पर हेलमेट लगा कर अपनी डिस्कवर और बुलेट पर, फिर से आयेगा वो दिन जब हम निकलेंगे पार्क में , फिर आयेगा वो दिन जब देश की रेलगाड़ियां हवाई जहाज और बसे अपनी गति से चलेंगी, फिर आयेगा वो दिन जब हम सब अपने अपने परिवार के साथ होंगे, आह कितना अच्छा दिन होगा वो जब ये ऐलान होगा कि अब पूरी दुनिया इस संक्रमण से जीत चुकी है, इंसान से ज़्यादा ज़िद्दी भला क्या होगा , कुछ भी हो सब अच्छा है , बस बार बार मगज ने यही प्रश्न आता है कि क्युकर रुक गए यहां, शायद यही लिखा था, पर हा जो होता है अच्छे के लिए होता है,

वहां दूर कहीं मेरा गांव है
नीम और बरगद का छांव है
वहीं सब के बैठने का ठाव है
वहां दूर कहीं मेरा गांव है....
अब तो शहर में ही मेरे पांव है
मझधार में ज़िन्दगी की नाव है
यहां धूप ज़्यादा, कम छांव है
वहां दूर कहीं मेरा गांव है...

Vipin Shukla "Rambo"