- बीएचयू के हिंदी विभाग में संचालित प्रयोजनमूलक हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के पूर्व विद्यार्थियों ने परिसर को किया याद 

- स्मरण और संवाद में परिसर नाम से ऑनलाइन प्लेटफॉर्म गूगल मीट पर हुई मीटिंग में साझा किए अनुभव 

- पाठ्यक्रम के वरिष्ठ प्राध्यापक प्रोफेसर अवधेश नारायण मिश्र से जुड़े अपने किस्से-कहानियों को किया साझा 


वैश्विक महामारी में दूरियों को पाटने का वर्चुअल प्लेटफार्म मील का पत्थर साबित हो रहा है। लोग न सिर्फ ’कम्यूनिकेशन गैप’ को ’फिल’ कर रहे हैं बल्कि महत्वपूर्ण मीटिंग, आयोजन और कार्यक्रम को भी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के सहारे पूरा कर रहे हैं।

ऐसा ही एक आयोजन 23 अगस्त, रविवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय के प्रयोजनमूलक हिंदी (पत्रकारिता) के पूर्व और वर्तमान विद्यार्थियों ने गूगल मीट के जरिए किया। ’स्मरण और संवाद में परिसर’ नाम से आयोजित इस कार्यक्रम में सभी विद्यार्थियों ने विभाग, पाठ्यक्रम और उससे जुड़े हुए अपने अनुभवों को साझा किया। इस दौरान सभी भाव-विह्वल हो गए।

कहते हैं कि इस दुनिया में गुरु से बढ़कर कोई नहीं है। गुरु ऐसा होता है तो जागरुक करता है, दिशा दिखाता है और सबसे बढ़कर एक इंसान बनाता है। ऐसे ही एक गुरु प्रोफेसर अवधेश नारायण मिश्र को सभी विद्यार्थियों ने याद किया। काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में कार्यरत प्रोफेसर अवधेश नारायण मिश्र ने प्रयोजनमूलक हिंदी पाठ्यक्रम को जिंदा और अपडेट रखने के लिए भगीरथ प्रयास किए। इस पाठ्यक्रम में दाखिला लेकर पढ़ने वाले विद्यार्थियों को उन्होंने न सिर्फ अनुशासन का पाठ पढ़ाया बल्कि भाषा और ज्ञान के स्तर पर भी उनको मांजा, संवारा।

इसी तरह से कुछ रुप में विद्यार्थियों ने उन्हें याद किया।

कार्यक्रम की शुरुआत डॉ. राजीव रंजन प्रसाद ने की। उन्होंने केदारनाथ सिंह के काव्य संग्रह ’अकाल में सारस’ की कविता ’चेहरा’ के जरिए कार्यक्रम की रुपरेखा प्रस्तुत की। कार्यक्रम के आयोजन के पीछे की प्रयोजनीयता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने संचालन का जिम्मा बृजेश कुमार मिश्र को सौंपा और वहीं धन्यवाद ज्ञापन की जिम्मेदारी अमृत सागर को दी।

सोनाली चक्रवर्ती ने वंदना ’गुरु बिना कौन मिटावे भवदुख’ को प्रस्तुत किया। नील दुबे ने बताया कि मिश्रा सर की डांट और फटकार ने उनके जीवन को पूरी तरह से बदल दिया। अमरेंद्र पांडेय ने अपने अनुभव में साझा किया कि मिश्रा सर ने प्रयोजनमूलक हिंदी पत्रकारिता पाठ्यक्रम के विद्यार्थियों के लिए जो कुछ भी किया है, उसे कोई और नहीं कर सकता है। वह बीएचयू के सर्वश्रेष्ठ शिक्षकों में शीर्ष पर हैं। पंकज तिवारी ने बताया कि उनके व्यक्तित्व निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण योगदान मिश्रा सर का ही है। अमृत सागर ने उन दिनों को याद करते हुए कहा कि लगातार दो दिन तक पांच मिनट लेट होने के कारण मिश्रा सर ने उन्हें कक्षा से बाहर कर दिया लेकिन अगले दिन वो दस मिनट पहले ही कक्षा में पहुंच गए और आज तक वे कहीं भी जाते हैं तो निर्धारित समय से पहले ही पहुंचते हैं। सीमा पांडेय ने बताया कि मिश्रा सर का मीठी-मीठी आवाज में खरे-खरे ताने मारने का जो तरीका था, वो उन्हें आज भी याद है। वे विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण कर्ता थे और बेहद अनुशासनप्रिय थे। शेषकांत दुबे ने बताया कि मिश्रा सर अपने आप में एक पुस्तकालय हैं। जुगल किशोर ने उन्हें एक अच्छे दोस्त की संज्ञा दी कि वो बेहिचक उनसे सब कुछ साझा कर सकते हैं। सोनाली जायसवाल ने बताया कि सर, लगातार ही प्रोत्साहित करते हैं। शांभवी शुक्ला ने तीन किस्सों के जरिए अपने वक्तव्य को पूरा किया। सचिन समर ने बताया कि मिश्रा सर से उनका गहरा जुड़ाव है । उन्होंने मिश्रा सर को बताया कि वो खुद बीएचयू हैं।

इसके बाद सुजाता कुमारी ने एक कविता के माध्यम से मिश्रा सर को याद किया। राजीव रंजन प्रसाद ने बताया कि जब भी वो सर के साथ होते थे तो बातों को नोट कर लिया करते थे। आज उनके पास एक लंबी फेहरिस्त है। उन्होंने कई बातों और सर के कथनों का जिक्र अपने वक्तव्य में किया। डॉ. मुंकेश शुक्ला ने मिश्रा सर से जुड़ी अनकही और अविस्मरणीय बातों को साझा किया। उन्होंने सर के जीवन से जुड़ी घटनाओं को साझा किया। इस के माध्यम से उन्होंने सर के व्यक्तित्व का एक अनोखा ही वर्णन किया।

दोपहर तीन बजे शुरु होकर देर शाम साढ़े सात बजे तक चलने वाले इस ऑनलाइन कार्यक्रम का संयोजन डॉ. राजीव रंजन प्रसाद ने किया जबकि संचालन की बागडोर बृजेश कुमार मिश्र ने संभाली। आखिर में धन्यवाद ज्ञापन अमृत सागर ने किया।