प्राणायाम दो शब्दों से मिलकर बना है प्राण और आयाम प्राण से तात्पर्य शरीर मे संचरित होने वाली वायु से है और आयाम का अर्थ नियंत्रण से है इस प्रकार प्राणायाम से तात्पर्य हुआ    स्वास और प्रस्वाश की क्रिया पर नियंत्रण करना। प्राणायाम करने के लिए स्थान स्वच्छ और हवादार होना चाहिए यदि खुले स्थान में अथवा नदी के समीप बैठकर प्राणायाम करें तो वह सबसे उत्तम है प्रणायाम करते समय बैठने के लिए हमेसा कम्बल, दरी अथवा चादर का ही प्रयोग करें प्राणायाम करते एक बात विशेष रूप से ध्यान रखना चहिये की गर्दन,कमर और रीढ़ की हड्डी को सीधा ही रखें।

*प्राणायाम आठ प्रकार के होते है* जिनमे *भस्त्रिका प्राणायाम प्रथम* होता है भस्त्रिका प्राणायाम में सांसो को धीरे धीमरे फेफड़े में भरना होता है और सहजता के साथ धीरे धीरे बाहर छोड़ना होता है भस्त्रिका प्राणायाम करने से सर्दी जुखाम, एलर्जी, स्वासरोग, दमा, नजला, साइनस,जैसे तमाम रोग नष्ट होते है साथ ही साथ रक्त भी परिशुद्ध हो जाता है दूसरा प्राणायाम कपालभाति होता है जिस प्राणायाम को धरती की  संजीवनी कहा जाता है इस प्राणायाम में सहजतापूर्ण सांस को अन्दर भरते है और पूरी एकाग्रता सांस हो बाहर छोड़ने में रखते है कपालभाति प्राणायाम से मोटापा,मधुमेह, गैस,कब्ज, प्रोस्टेट, डिप्रेशन, घबराहट, सहित समस्त मनोरोग से छुटकारा मिलता है कपालभाति प्राणायाम पेट के ऑपरेशन, गर्भावस्था, अथवा मासिक धर्म की अवस्था मे नही करना चहिये। तीसरा प्राणायाम वाह्य प्राणायाम होता है जिसमे सम्पूर्ण साँस को बाहर निकाल कर त्रिबंध मूलबन्ध, उड्डियान बंध, एवम जालंधर बंध, लगाकर कुछ सेकेंड स्वाश को बाहर की रोककर रखते है फिर बंधो को हटाते हुए धीरे धीरे सांस को लेते है बाह्य प्राणयाम से पाईल्स, फिशर, गुदाभ्रंश, स्वप्नदोष,शीघ्रपतन, जैसी बीमारियों में लाभ मिलता है। चौथा प्राणायाम उज्जायी प्राणायाम- होता है जिसमे दोनो नाको से पूरक करते हुए गले को सिकोड़ते है और गले को सिकोड़कर स्वास को अन्दर भरते है तब गले से खर्राटे लेने जैसे आवाज आती है। इस प्राणयाम  थायराइड स्नोरिंग, ज्वर, बच्चो का तुतलाना, हकलाना, ठीक हो जाता है पांचवा प्राणयाम अनुलोम विलोम होता है जिसमे एक नाक को बंद करके दूसरी नाक से स्वाश को अंदर भरते है फिर जिस नाक से स्वास को अन्दर भरते है उसे बंद करके जो नाक पहले से बंद थी उसे खोलकर सांस को उसी नाक से बाहर निकलते हैं अनुलोम विलोम प्राणायाम से शरीर मे विद्यमान बहत्तर करोड़ बहत्तर लाख दस हजार दो सौ एक नाड़िया परिशुद्ध हो जाती है तथा कोलेस्ट्रॉल, मेमोरी लॉस, आदि रोग में लाभ मिलता है छठा प्राणयाम भ्रामरी प्राणायाम होता है जिसमे स्वास को पूरा अन्दर भरकर मध्यमा अंगुलियों से नासिका के मूल में रखकर दबाना होता है मन को आज्ञाचक्र पर केंद्रित रखते है और दोनों अंगूठो से कान को बन्द कर के रखते है तथा भौरे की भांति गुंजन करते हुए ॐ शब्द का उच्चारण करते है इस प्राणयाम से माइग्रेन, मानसिक उत्तेजना, मन की चंचलता, तथा घबराहट संबंधित रोगों में लाभ मिलता है सातवा प्राणायाम उदगीथ प्राणयाम होता है स्वास को एक लय के साथ अंदर भरना तथा ॐ शब्द का उच्चारण करना होता है तथा 15 से 20 सेकेण्ड में स्वास को बाहर छोड़ना होता है इस प्राणायाम से तनावग्रस्त, निराश,विछिप्त व्यक्ति को लाभ मिलता है एवम ध्यान की गहराइयों में उतरने के साधकों के लिए बेहद लाभकारी होता है।

 नोट:- आठवा प्राणायाम प्रवण-ध्यानयोग मेरे अगले अध्याय मे  रहेगा।

 

  - योग गुरु राज यादव

जिला महाविद्यालय प्रभारी युवा भारत पतंजलि जौनपुर उत्तर प्रदेश

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