जब तक वह था तब तक उसके भी मित्र-शत्रु थे, अब जब वह नहीं है तो सब मित्र हैं- शत्रु कोई नहीं है- यही संसार का चलन है. हिंदी तो इसकी आदी है सो मंगलेश के जाने के बाद उसके मित्रों की शोक श्रद्धाजलियां देखकर भला भी लग रहा है और दुखद भी कि ‘जीते कंता पूछी न बात मरे लगाई अपने साथ ’- हिंदी में जीते जी कोई किसी के ‘गुन’ नहीं गिनाता लेकिन मरते ही उसके ‘गुनगाहक’ आ जुटते हैं उसे देवता बनाने लगते हैं- मैं तो कहूंगा कि मंगलेश को मंगलेश ही रहने दो देवत्व न दो!


वह जिंदा होता तो शायद खुद कहता कि ये सब ऐसे ही चलाते हैं- यह सन उनहत्तर-सत्तर की बात होगी जब मंगलेश डबराल से पहली मुलाकात हुई. वह अपने मित्र त्रिनेत्र जोशी के साथ ‘मॉडल डाउन टू’ के मकान ‘सी 12’ में एक मियानी में रहता था जिसकी छत पांच फुट उंची थी. आप सीधे खड़े नहीं हो सकते थे- उसी मकान के उपर की मंजिल पर हिंदी के प्रसिद्ध कवि शमशेर और बीच की मंजिल में कवि मलयज रहते और उनके नीचे ये दोनों युवा कवि रहते. मंगलेश ‘हिंदी पेट्रियट’ में शायद अस्थायी नौकरी करता था. त्रिनेत्र ‘फ्रीलांसिंग’ करता था. मकान क्या था, साहित्य ही साहित्य था- तब का मॉडल टाउन ऐसे ही साहित्यिक माहौल वाला था- मियानी क्या थी? एक दडबा भी- नीचे मैलभरी दरी बिछी होती- दो तैलाक्त मुचड़ी रजाइयां और उतने ही तैलाक्त टूटे तकिए- कुछ टूटे कप, चाय बनाने की एक केतली, एक स्टोव और किनारे एक टपकता हुआ नल और बीडी के टुर्रे बिखरे रहते- कमरे में धुएं और सीलन की मिली जुली गंध नाक में घुसकर घर कर लेती- आप आदी हो जाते.


मैं अक्सर रविवार की सुबह-सुबह जाता तो दोनों महाशय जगते- फिर पत्ती दूध होता तो चाय बनती और इंदिरा गांधी की नीतियों से लेकर लेनिन, माओ, चे आदि की लाइनों पर बहसें शुरू हो जाती- मंगलेश जल्दी उब जाता तो मजाज लखनवी की ‘ऐ गमे दिल क्या करूं ऐ वहशते दिल क्या करूं ’ गाने लगता और हम सब गाने लगते. गाते वक्त वह नहीं हकलाता था लेकिन जब बहस में फंस जाता था तो हकलाहट बढ़ जाती थी लेकिन उसका गला अच्छा था. त्रिनेत्र नक्सल लाइन लेता- मंगलेश बीच की लाइन लेता, तीखी बहसें होतीं- चाय पी जाती, कमरे में न बन पाती तो नीचे उतर कर चाय वाले से पी जाती- फिर एक दिन पेट्रियट में हड़ताल हो गई और वो सड़क पर आ गया- तब के निम्नवर्गीय युवाओं का जीवन इसी तरह चलता था- कभी घी घना, कभी मुठ्ठी भर चना, कभी वो भी मना.


यह कांग्रेस विरोधी रेडीकलाइजेशन का दौर था. मार्क्सवाद खींचता-मजदूर वर्ग जिंदाबाद होता-पूंजीवाद मुर्दाबाद होता-क्रांति दरवाजे पर दस्तक दे रही लगती- ये ऐसे ही गरम दिन थे- फिर आपातकाल लगा और सब तितर-बितर हो गया. त्रिनेत्र जेएनयू में चीनी पढ़ने लगा, मंगलेश लखनऊ में शायद ‘अमृत प्रभात’ में काम करने लगा जहां उसने अपनी साहित्यिक पत्रकारिता को चमकाया फिर वह अशोक वाजपयी के ‘पूर्वग्रह’ में सहायक का काम करने चला गया फिर अनबन हुई फिर जब दिल्ली से ‘जनसत्ता’ निकला तो वह उसकी ‘रविवारी जनसत्ता’ को देखने लगा.


शायद 1984-85 में एक बार फिर उससे अपने तार जुड़े. मैं जनसत्ता में लिखने लगा- फिर उसने टीवी के रिव्यू का एक साप्ताहिक कॉलम लिखने को कहा जिसका ‘देखी सुनी’ नाम उसी ने रखा और मैं ‘अज़दक’ के छद्मनाम से लिखने लगा जो पैंतीस बरस से अब तक (कुछ बदलकर) कायम है. मैं सप्ताह में बुधवार को उसे अपना पीस देने जाता, उसके साथ बैठता, साहित्यिक गप्पें चलती- हिंदी के एक से एक युवा रचनाकार आते रहते- उसका कमरा साहित्यिक अड्डे में बदल जाता- सबकी निंदा स्तुति होती- वह हर रचना पर मेहनत करता और संपादन करता. अपनी मेहनत से ‘रविवारी’ का जो स्ट्रक्चर उसने बनाया उसने हिंदी साहित्यिक पत्रकारिता में सबसे उंची जगह बनाई. उसके रिव्यू पेज पर सख्त टेक्सचुअल रिव्यूज होते जिनका असर होता, उसमें बहुत मेर तेर नहीं चलता था. मेरे कॉलम को वह जस का तस छापा करता था-

रविवारी में मुद्दा-केंद्रित बहसें होतीं- बडे साहित्यकारों के पूरे-पूरे पेज के साक्षात्कार छपते- ‘रविवारी जनसत्ता’ ने उस वक्त के ‘धर्मयुग’ को भी ‘टेकओवर’ कर लिया था.


मिजाज से वह कवि था. उसकी कविताएं छोटी पत्रिकाओं में छपने लगी थीं. उसकी एक कहानी ‘आया हुआ आदमी’ ‘सारिका’ में छपी थी. इस बीच उसकी लाइन नक्सल वाली होने लगी थी लेकिन मेरे जाने वह किसी कम्यूनिस्ट पार्टी का बाजाप्ता सदस्य कभी न बना. वह अन्य बहुत से साहित्यकारों की तरह वामपंथी राजनीति का पक्षधर अवश्य रहा.


इसी दौर में उसका पहला कविता संकलन ‘पहाड़ पर लालटेन’ आया जो खूब चर्चित रहा. फिर एक के बाद एक संकलन आते गए. उसने अनुवाद भी किए, यात्रा वृत्तांत लिखे. उसकी भाषा सर्वत्र इमोटिव होती- ‘विडंबना’ (आइरनी) उसका मुख्य औजार होती. सन दो हजार में उसे ‘साहित्य अकादमी’ भी मिला. इससे उसके कई मित्र शत्रु भी बने. उनमें से कई अब विशेषोक्तियों से भरी शोक-श्रद्धांजलियां दे रहे हैं. ऐसे विशेषणों से मित्र शत्रु पहले नवाज देते तो उसकी इम्यूनिटी कुछ बेहतर हो जाती.


इस बीच नए निजाम की रीति-नीति के विरोध में मंगलेश ने अन्यों के साथ-साथ अपना अकादमी सम्मान भी लौटाया और इस तरह से वह उस टोल का प्रिय हो गया जिससे उनकी कल तक बनती न थी. मैंने विरोध की अंतर्विरोधी मुद्रा पर तंज किया तो कई मेरे दुश्मन हो गए शायद मंगलेश को भी अच्छा न लगा. हमारे बीच बात कम हो गई. उसकी हार्ट प्राब्लम की सुनकर मैंने फोन पर उसका हाल चाल लिया लेकिन उसने पलट कर कभी फोन न किया जबकि पहले फोन आते जाते रहते थे.


हमारी दूरी बढ़ी. कुछ मित्रें का भी योगदान रहा फिर भी मैं उसको लेकर चिंतित रहता और लोगों से उसके हालचाल पूछता रहता.


पिछले पांच-सात बरस से मंगलेश प्रायः ‘अवसाद’ की कविताएं लिखने लगा था फिर उसकी कविता में क्रोध के चिन्ह भी नज़र आने लगे जो उसकी कविता के मिजाज के विपरीत थे.


एक दिन वह ‘कोविड 19’ की चपेट में आ गया और डाक्टरों की सारी कोशिशों के बावजूद न बचाया जा सका. जाना तो सबको होता है लेकिन जब कोई अचानक चला जाता है तो बहुत कसकता है. पचास बरसों की कितनी ही यादें हैं जो मन को बार-बार कुरेद रही हैं.

कुल मिलाकर वह एक बेहद नरम तबियत वाला एक दोस्त और इंसान था लेकिन अपने प्रति कुछ लापरवाह भी था. मगर अब इससे क्या? ‘कोविड 19’ को किसी पर रहम नहीं आता.

काश! ‘कोविड 19’ न होता तो वह अपना ‘कवि कोविद’ अवश्य ही हमारे बीच होता!

सुधीश ‌पचौरी

(लेखक हिन्दी साहित्यकार, आलोचक एवं मीडिया विश्लेषक हैं. व्यक्त संस्मरण निजी हैं)


साभार - द प्रिंट ThePrint Hindi