1857 अंग्रेजों को डर था कि मंगल पांडे ने विद्रोह की जो चिंगारी जलाई है वह देशभर में कहीं ज्वाला न बन जाए। आइये जानते हैं पूरी कहानी।  1850 के दशक में सिपाहियों के लिए नई इनफील्ड राइफल लाई गई थी। इसमें लगने वाली कारतूसों को मुंह से काटकर राइफल में लोड करना होता था। बैरकपुर रेजीमेंट के सिपाहियों को पता चला कि इनमें लगने वाली कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी मिली होती थी।



 इसके बाद हिंदू और मुस्लिम दोनों वर्ग के सिपाहियों ने नाराजगी जताई। 29 मार्च 1957 को मंगल पांडेय ने विद्रोह कर दिया, उस वक्त वह बंगाल के बैरकपुर छावनी में तैनात थे। उन्होंने न केवल कारतूस का इस्तेमाल करने से मना कर दिया बल्कि साथी सिपाहियों को 'मारो फिरंगी को' नारा देते हुए विद्रोह के लिए प्रेरित किया। उसी दिन मंगल पांडे ने दो अंग्रेज अफसरों पर हमला कर दिया। बाद में उनके खिलाफ मुकदमा चलाया गया और उन्होंने अंग्रेज अफसरों के खिलाफ विद्रोह की बात स्वीकार की। उन्हें फांसी की सजा सुनाई गई और तारीख 18 अप्रैल तय की गई।


मंगल पांडेय ने 29 मार्च 1857 को विद्रोह कर दिया। बीबीसी की एक रिपोर्ट में सैनिक विद्रोह और मंगल पांडेय के बगावत के दौरान खुद पर गोली चला लेने का जिक्र है।  इस रिपोर्ट के अनुसार बैरकपुर में कई तरह की अफवाहें फैल रही थीं इनमें से एक ये भी थी कि बड़ी संख्या में यूरोपीय सैनिक हिंदुस्तानी सैनिकों को मारने आ रहे हैं। इसी दौरान 29 मार्च की शाम जब मंगल पांडेय को इसकी खबर लगी तो उन्होंने अपने बटालियन के सैनिकों को विद्रोह के लिए एकजुट करना शुरू कर दिया।  ब्रिटिश इतिहासकार रोज़ी लिलवेलन जोन्स ने अपनी किताब “द ग्रेट अपराइजिंग इन इंडिया, 1857 – 58 अनटोल्ड स्टोरीज, इंडियन एंड ब्रिटिश” के हवाले से इस घटना का जिक्र किया गया है।


जोन्स के अनुसार, ”तलवार और अपनी बंदूक से लैस मंगल पांडेय ने क्वार्टर गार्ड (बिल्डिंग) के सामने घूमते हुए अपनी रेजिमेंट को भड़काना शुरू कर दिया। जब अडज्यूटेंट लेफ्टिनेंट बेंपदे बाग को इस बारे में बताया गया तो वह अपने घोड़े पर सवार होकर वहां पहुंचे और मंगल पांडेय को अपनी बंदूक लोड करते हुए देखा। मंगल पांडेय ने गोली चलाई और निशाना चूक गया, बाग ने भी अपनी पिस्तौल से पांडेय पर निशाना साधा, लेकिन गोली निशाने पर नहीं लगी।”


पूरी घटना के चश्मदीद गवाह हवलदार शेख पल्टू के मुताबिक इससे पहले मंगल पांडेय ने सार्जेन्ट मेजर जेम्स ह्वीसन पर भी गोली चलाई थी लेकिन ये गोली ह्वीसन को नहीं लगी जिसके बाद उन्होंने तलवार से ही दोनों अंग्रेज अधिकारियों को घायल कर दिया। लेकिन फिर शेख पल्टू ने मंगल पांडेय को कमर से पकड़ लिया


इतिहासकार जोन्स आगे लिखती हैं, “घुड़सवार और कई पैदल सैनिकों ने मंगल पांडे की ओर बढ़ना शुरू कर दिया और ये देखकर मंगल पांडे ने बंदूक की नाल को अपने सीने में लगाया, पैर के अंगूठे से ट्रिगर दबाया। गोली से उनकी जैकेट और कपड़े जलने लगे और वह घायल होकर जमीन पर गिर पड़े।”


इसके बाद मंगल पांडेय जख्मी रहे। उनपर बागी होने का मुकदमा चला और 18 अप्रैल 1857 को फांसी देने की तारीख तय हुई। लेकिन उनके बगावत की बात  बहुत तेज़ी से भारतीय सैनिकों में फैल रही थी। अंग्रेजों को डर था कि कहीं यह बगावत देश भर में न फैल जाए। इसी भय से उन्हें आनन-फानन में 8 अप्रैल 1857  को उन्हें फांसी दे दी गई। उनकी फांसी के बाद मेरठ, कसौली, कांगड़ा, धर्मशाली समेत देशभर में कई जगहों पर सिपाहियों ने विद्रोह कर दिया।