महात्मा गांधी के संरक्षण में प्रकाशित समाचार पत्र ‘हरिजन’ के सम्पूर्ण अंक वर्धा के गांधी ज्ञान मंदिर पुस्तकालय में सुरक्षित हैं। गांधी जी ने हरिजनों के उद्धार के लिए 11 फरवरी 1933 को ‘हरिजन’ नामक अंग्रेजी साप्ताहिक समाचार पत्र निकाला था। गांधी जी की प्रेरणा से ‘हरिजन’ कतिपय भारतीय भाषाओं में भी निकला। हिंदी में वह ‘हरिजन सेवक’, गुजराती में ‘हरिजन बंधु’ और मराठी में ‘मराठी हरिजन’ नाम से निकला। इसके अलावा देशभर में गांधीजी ने हरिजन सेवक संघ की शाखाएं बनाईं। संघ की अछूतोद्धार संबंधी साप्ताहिक गतिविधियों की जानकारी ‘हरिजन’ के हर अंक में दी जाती थी। ‘हरिजन’ के प्रवेशांक (11 फरवरी 1933) की संपादकीय में ही गांधी जी ने ‘अस्पृश्यता’ शीर्षक संपादकीय लिखी और उसमें स्पष्ट कहा कि जातीय छुआछूत शास्त्रों के खिलाफ है। प्रवेशांक में ही गांधी ने सात पंडितों के हस्ताक्षर का एक पत्र प्रकाशित किया जिसमें कहा गया था कि चारों वर्णों में जो समान अधिकार हैं, उनका अधिकार हरिजन को मिलना चाहिए। ये अधिकार हैं-मंदिर प्रवेश, शालाओं में शिक्षा, सार्वजनिक कुंओं, घाटों, तालाबों और नदियों में निस्तार सुविधा। गांधी जी के सच्चे दलित हितैषी होने की पुष्टि अपना मैला साफ करने से लेकर अगले जन्म में हरिजन महिला के रूप में पैदा होने की उनकी इच्छा से भी होती है। 

‘हरिजन’ के पहले गांधीजी ने सत्याग्रह की शिक्षा देने के उद्देश्य से दो अगस्त 1919 को अंग्रेजी साप्ताहिक ‘यंग इंडिया’ और सात सितंबर 1919 को गुजराती साप्ताहिक ‘नवजीवन’ निकाला था। ‘नवजीवन’ बाद में हिंदी में भी निकला। उसके पहले गांधीजी ने दक्षिण अफ्रीका में 4 जून 1903 को साप्ताहिक समाचार पत्र ‘इंडियन ओपिनियन’ निकाला था। 1904 में गांधीजी ने जान रस्किन की प्रसिद्ध पुस्तक ‘अन टू दिस लास्ट’ का गुजराती में ‘सर्वोदय’ शीर्षक से अनुवाद प्रकाशित किया। ‘इंडियन ओपिनियन’ को सत्याग्रह शब्द का संधान करने का श्रेय भी जाता है। गांधीजी की पुस्तक ‘हिंद स्वराज’ के पहले 12 अध्याय पहली बार ‘इंडियन ओपिनियन’ के 11 दिसंबर 1909 के अंक में और शेष आठ अध्याय 18 दिसंबर 1909 के अंक में छपे। गांधीजी ‘इंडियन ओपिनियन’ से 1914 तक जुड़े रहे। उन्होंने स्वयं लिखा है, “जेल के समयों को छोड़कर दस वर्षों के अर्थात् सन् 1914 तक के ‘इंडियन ओपिनियन’ के शायद ही कोई अंक ऐसे होंगे, जिनमें मैंने कुछ लिखा न हो। इनमें मैंने एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले लिखा हो या किसी को केवल खुश करने के लिए लिखा हो अथवा जान-बूझकर अतिशयोक्ति की हो, ऐसा मुझे याद नहीं पड़ता।” गांधी जी की इस टिप्पणी से आज के पत्रकार यह सीख ले सकते हैं कि उन्हें एक भी शब्द बिना विचारे, बिना तौले या किसी को खुश करने के लिए नहीं लिखना चाहिए। न अतिशयोक्ति करनी चाहिए। गांधीजी के पत्रकारीय लेखन की शुरुआत 1891 में लंदन से जोसिया ओल्डफील्ड के संपादन में छपनेवाली साप्ताहिक पत्रिका ‘द वेजेटेरियन’ से हुई थी। गांधीजी की समूची पत्रकारिता सम्पूर्ण सत्य पर आधारित थी। उनका सम्पूर्ण जीवन सत्य का प्रयोग करते ही बीता। गांधीजी ने सत्य को ईश्वर माना था। कहने की जरूरत नहीं कि आज के फेक न्यूज और पोस्ट ट्रुथ के इस तिमिर दौर में गांधीजी की पत्रकारिता से ही प्रेरणाएं ली जा सकती हैं।


- कृपाशंकर चौबे