बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता दिलीप कुमार का बुधवार सुबह निधन हो गया. वे लंबे समय से बीमार चल रहे थे और 98 साल की उम्र में उन्होंने मुंबई के हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली. दिलीप कुमार का फिल्मों के साथ-साथ सियासत से भी नाता रहा है. पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपना आर्दश मानने वाले दिलीप कुमार राज्यसभा सदस्य भी रहे. नेहरू के प्रति वे हमेशा वफादार रहे और जब भी नेहरू ने उन्हें प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया दिलीप कुमार ने कभी ना नहीं कहा. इस तरह नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर सोनिया गांधी सहित कई समाजवादी नेताओं ने दिलीप कुमार की पॉपुलरटी को अपने-अपने हिसाब से राजनतीकि तौर पर कैश कराया है. 


बता दें कि पंडित जवाहर लाल नेहरू जिस दौर में 1947 से लेकर 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे, उस दौरान दिलीप कुमार ने अपनी फिल्मों में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे नेहरूवादी विचारों को खूब जगह दी. दिलीप कुमार की फिल्म चाहे 1957 में आई 'नया दौर', 1961 में आई 'गंगा जमुना' हो या फिर 1964 में आई 'लीडर' नेहरूवादी विचारों पर ही आधारित थीं.


नेहरू जब दिलीप कुमार से मिलने सेट पर पहुंच थे


वरिष्ठ पत्रकार राशिद किदवई की लिखी दिलीप कुमार की आत्मकथा में इस बात का जिक्र किया गया है कि 1959 में 'पैगाम' फिल्म की शूटिंग के दौरान प्रधानमंत्री नेहरू सेट पर पहुंचे थे तो वहां पर मौजूद सभी को लगा कि वे सबसे पहले फिल्म की हीरोइन वैजयंती माला से मिलेंगे, लेकिन उन्होंने आगे बढ़कर लाइन में सबसे आखिर में खड़े फिल्म के हीरो दिलीप कुमार के कंधे पर अपना हाथ रखा. 'यूसुफ, मुझे पता चला कि तुम यहां हो और मैंने आने का फैसला कर लिया!' यही से नेहरू और दिलीप कुमार के बीच दोस्ती गहरी हो गई. 


दिलीप कुमार के बोलने के अंदाज का पूरा देश ही कायल था. इस मुलाकात के एक साल बाद दिलीप कुमार को पंडित नेहरू को एक दूसरे की जरूरत पड़ी. सेंसर बोर्ड में दिलीप कुमार की फिल्म गंगा जमुना में 'हो राम' शब्द के चलते सेंसर बोर्ड पास नहीं कर रहा था. ऐसे में पंडित नेहरू के दखल के बाद न सिर्फ 'गंगा जमुना' पास कर दी गई बल्कि दिलीप कुमार की बाकी फिल्मों को भी सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिली. 


नेहरू ने दिलीप कुमार को कांग्रेस सम्मेलन में बुलाया


वहीं, नेहरू के प्रति दिलीप कुमार हमेशा वफादार रहे और जब भी नेहरू ने उन्हें प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया दिलीप कुमार ने कभी ना नहीं किया. नेहरू ने दिलीप कुमार को साठ के दशक में युवक कांग्रेस के एक सम्मेलन में भाषण देने के लिए बुलाया था और कहा था कि हमारे संगठन में भी ऐसे बहुत कम लोग हैं जो दिलीप कुमार जैसी कुशलता से अपनी बात कह सकते हैं. नार्थ बॉम्बे से वीके कृष्ण मेनन के लिए नेहरू के कहने पर दिलीप कुमार ने चुनाव अभियान भी में हिस्सा लिया था और उनको जिताने में मदद की थी. 

 

दिलीप कुमार और सलमान खुर्शीद

दिलीप कुमार ने फिल्मों में आने के 18 साल बाद जाकर पहली बार सार्वजनिक तौर पर मेनन का चुनाव प्रचार कर खुद को राजनीति से जोड़ा था और फिर तो जैसे यह सिलसिला बिना रुके चलता ही रहा. 1979 में वे बॉम्बे के शेरिफ बने और 2000 से 2006 के बीच राज्य सभा सदस्य भी रहे. भले ही राजनीति क्षेत्र से उनका नाता सिनेमा के हितों तक सीमित रहा, लेकिन दिलीप कुमार की राजनीति का लक्ष्य भाईचारे और सांप्रदायिक सद्‍भाव के लिए काम करना और संविधान के सेक्युलर ढांचे की रक्षा करना मात्र रहा. 


कांग्रेस और सपा प्रत्याशी के लिए किया प्रचार


बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दिलीप कुमार भारतीय राजनीति में और भी संभलकर चलने लगे और अपने आपको केवल चुनिंदा-प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार तक सीमित कर लिया. इसी दौरान उन्होंने कहीं कांग्रेसी और कहीं समाजवादी प्रत्याशियों को जिताने के बयान जारी किए थे.1996 के आम चुनाव में दिलीप कुमार ने अलवर (राजस्थान) में कांग्रेस प्रत्याशी दुरु मियां के लिए प्रचार किया था तो अलीगढ़ में समाजवादी उम्मीदवार सत्यपाल मलिक को जिताने की अपील की थी.  


दिलीप कुमार ने घोषणा की थी कि उन्होंने राजनी‍ति में प्रवेश नहीं किया है, वे सिर्फ देश की एकता और अखंडता में विश्वास करने वाले उम्मीदवारों के लिए बोलेंगे. अगस्त 1997 में दिलीप कुमार ने लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम ओबीसी कॉन्फ्रेंस में मुसलमानों से आह्वा‍न किया कि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ें. यह पहला मौका था जब वे मुस्लिम समुदाय के समर्थन में खुलकर सामने आए थे.


रायबरेली में कांग्रेस को जिताने की अपील की


कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी ने संभालने के बाद दिलीप कुमार ने 1998 के लोकसभा चुनाव में दिलीप कुमार ने साउथ दिल्ली सीट पर डॉ. मनमोहन सिंह के लिए प्रचार किया था. इसके बाद 1999 में दिलीप कुमार ने दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी चुनाव प्रचार किया. 1999 में गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली में जाकर कैप्टन सतीष शर्मा और अमेठी में सोनिया गांधी के लिए चुनाव प्रचार किया था. 


बाल ठाकरे और दिलीप कुमार की दोस्ती


पक्का कांग्रेसी होने के बावजूद कट्टर हिंदुत्व समर्थक बाल ठाकरे से भी दिलीप कुमार की घनिष्ठता रही. दोनों एक-दूसरे को तब से जानते थे जब बाल ठाकरे अखबारों में मारक कार्टून बनाया करते थे और दिलीप कुमार को उनकी व बाल ठाकरे को दिलीप कुमार की कला पसंद आया करती थी. बाल ठाकरे के निवास मातोश्री में दिलीप कुमार का आना-जाना लगा रहता था. हालांकि, 1997 में पाकिस्तान सरकार ने दिलीप कुमार को 'निशान-ए-इम्तियाज' से नवाजने का फैसला किया तो बाल ठाकरे इसके खिलाफ थे और उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिलीप कुमार की आलोचना की थी. 


वाजपेयी- दिलीप कुमार का रिश्ता


निशान-ए-इम्तियाज वाले विवाद के दौरान दिलीप कुमार की मदद पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने की थी. इस मसले पर वाजपेयी ने दिलीप कुमार से कहा था कि वे बाल ठाकरे को नजरअंदाज कर यह सम्मान लेने पाकिस्तान जाएं. उन्होंने कहा, 'एक कलाकार राजनीतिक और भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधा होता. आपको यह पुरस्कार मानवीय कार्यों के लिए दिया जा रहा है और हिंदुस्तान-पाकिस्तान के बीच के रिश्तों को सुधारने में आपके द्वारा दिए गए योगदान से सभी परिचित हैं.' 


राशिद किदवई अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि 1999 के कारगिल युद्ध के बाद अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ को फोन कर अपनी नाराजगी जाहिर की थी. इसके बाद वाजपेयी ने फरमाया कि वे चाहते हैं कि नवाज शरीफ किसी से बात करें. इस पर वाजपेयी ने अपने बगल में बैठक दिलीप कुमार से नवाज शरीफ की बात कराई थी. अटल ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी थी कि वे उनके साथ बैठकर नवाज शरीफ से बात करें और दोनों देशों के बीच उपजे तनाव व शत्रुतापूर्ण माहौल को खत्म करने की कोशिश करें. 


दिलीप कुमार ने नवाज शरीफ से कहा था, 'मियां साहिब, हमें आपसे ऐसी उम्मीद नहीं थी, क्योंकि आप हमेशा हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने की वकालत किया करते थे. मैं आपको बतौर एक हिंदुस्तानी मुसलमान बताना चाहूंगा कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच तनाव होने पर हिंदुस्तानी मुसलमानों की स्थिति जोखिम भरी हो जाती है और उन्हें घर से बाहर निकलने तक में मुश्किल होती है. इस स्थिति को संभालने के लिए प्लीज कुछ कीजिए.'


दिलीप कुमार और शरद पवार की दोस्ती


शरद पवार से भी दिलीप कुमार की अच्छी मित्रता थी. महाराष्ट्र के कद्दावर नेता और एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार को दिलीप साहब उनके यूथ कांग्रेस के दिनों से जानते थे. पंडित नेहरू से निकटता के चलते वे वकील, ट्रेड यूनियन लीडर तथा कांग्रेसी नेता रजनी पटेल के दोस्त बने थे और उन्हीं की मार्फत शरद पवार से उनकी दोस्ती हुई थी. ऐसे में दिलीप कुमार ने  शरद पवार का प्रचार भी किया और इससे यह दोस्ती और गाढ़ी हुई.


राजनीति, सार्वजनिक जीवन के अलावा दिलीप कुमार के निजी जीवन में भी बहुत काम आई. सक्रिय राजनीति से वे हमेशा दूर रहे, उसकी आग में अपनी उंगलियां नहीं जलाईं, लेकिन देश के अहम सक्रिय राजनेताओं के करीबी हमेशा बने रहे और वो अपनी पॉपुलरटी के जरिए राजनीतिक दलों को सियासी लाभ भी दिलाते रहे. इस तरह से नेहरू से लेकर सोनिया और अटल बिहारी वाजपेयी तक ने दिलीप कुमार को अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया और सियासी लाभ उठाया.