श्रीराम केवल व्यक्ति या भगवान नहीं बल्कि हिन्दू संस्कृति की जीवन्त परम्परा हैं। राम से किसी व्यक्ति का परिचय नही अपितु सम्पूर्ण भारतवर्ष का परिचय मिलता है। ’’रमते कणे कणे इति रामः’’ अर्थात जिसकी मर्यादा, आदर्श, महान व्यक्तिŸव कण-कण में रमा हो वही राम है। राम शान्त स्वभाव के वीर पुरूष थे। उन्होंने मार्यादाओं को सर्वदा सर्वोच्च स्थान दिया। राम का चरित्र पुत्र, पति, भाई, विद्यार्थी, सहायक, योद्धा, मित्र, पिता तथा राजा इन सभी कसौटियों पर खरा उतरता है। पुत्र रूप में पिता दशरथ के आदेशों का पालन, पति रूप में सीता-रक्षण, अनुजों के लिए अगाध प्रेम तथा त्याग, गुरु वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त करना, राक्षसों से मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, रावण से युद्ध, सुग्रीव की मित्रता आदि श्रीराम के आदर्शपूर्ण तथा अनुकरणीय दिव्य उदाहरण कहे जा सकते हैं। रावण वधोपरान्त उनके द्वारा किसी सक्रिय युद्ध में भाग लेने की सूचना नहीं मिलती। उनकी मित्रता, सम्मान, तेजस्वी व्यक्तित्व और इनसे भी बढ़कर राज्य की व्यवस्था से सुप्रभावित हो समकालीन शासकों ने स्वयं को साष्टांग समर्पित कर दिया अतः श्रीराम के लिए अश्वमेध यज्ञ तो प्रतीकात्मक ही था। कालान्तर में कलिंग युद्ध के पश्चात ठीक ऐसा ही अनुकरण हमें सम्राट अशोक की छवि में भी दिखलायी पड़ता है। ऐसा प्रतीत होता है कि श्रीराम ही अहिंसा के प्रथम संस्थापक-उपासक थे। अपने सुख दुःख तथा परिणाम की चिंता किये बिना प्राणियों के उद्धार में लगे रहने वाले श्रीराम के साथ अनेक विवाद भी जुड़े और समय के साथ-साथ इनकी संख्या में वृद्धि भी हुई। विरोधी जनों द्वारा श्रीराम की छवि धुमिल करने की श्रृंखला भी बनायी गई। कम्ब रामायण में तो सीता को राम की बहन बतलाया गया। बौद्ध ग्रंथ दशरथ जातक में सीता को राम की पुत्री कहा गया; किंतु इसके विपरीत श्रीराम की महिमा खंडित होने की अपेक्षा मंडित ही हुई। दशरथ ने पुत्र की कामना से यज्ञ करवाया जिसके फलस्वरूप ही श्रीराम उनके ज्येष्ठ पुत्र के रूप में धरती पर मानव रूप में प्रकट हुए। ऐसा नही है कि श्रीराम यज्ञ विधि से उत्पन्न होने वाले इकलौते वीर थे। यज्ञ से मनोवांछित फल तथा जन्म लेने की लम्बी परम्परा रही है। वैदिक काल की व्यवस्था ही यज्ञों पर टिकी हुई थी। यहाँ तक की अनेक जातियों का उदय भी यज्ञ से हुआ है। मध्यकाल में तो प्रतिहार, चालुक्य, चाहमान, और परमार आदि की उतपति वसिष्ठ मुनि द्वारा आबू पर्वत पर किये गये यज्ञ से हुई। भारतीय संस्कृति में इस प्रकार की प्रवृति का प्रसार संम्भवतः किसी महान, विनम्र, वीर, सम्मानित, प्रभावशाली तथा लोकप्रिय व्यक्ति के कृत्यों में अप्रत्याशित वृद्धि के लिए हुआ होगा। अब श्रीराम जैसे दिव्य आदर्श पुरूष का स्थान तो सर्वोवरि था। अतः समय के साथ-साथ उनके जन्म, कृतित्व तथा व्यक्तित्व में अलौकिक, पारलौकिक, सार्वभौमिक तथा दैवीय गुणों का मिलना स्वाभाविक था। मुनि वाल्मिकी तथा संत तुलसीदास ने श्रीराम की अलौकिकता को जन-जन तक प्रसारित किया। श्रीराम का जन्म त्रेतायुग में होना दिखलाता है कि श्रीराम के आदर्श प्राचीन काल से ही स्थापित एवं चले आ रहे हैं। मनुष्य जाति को ऐसे गुणों का अनुकरण करना चाहिए। वास्तव में श्रीराम कल्याणकारी तथा उद्धारक थे। इसिलिए उन्हें भगवान विष्णु के अवतार के रूप में भी मान्यता मिली। कलियुग के हजारो वर्ष बीत जाने के बाद भी समाज में श्रीराम के आदर्शों को मनुष्य जाति स्मरण कर ’हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे’ कर उनके समय की सुव्यवस्था को पुनः स्थापित करने की कामना के साथ विलाप करती है। जब कोई गलत कार्य करता है तो विरोध करने वाला ’राम राम’ ही कहता है अर्थात काश! राम का समय होता तो शायद ऐसा न होता। कोई किसी पर हिंसा अथवा प्रहार करता है तो पीड़ित के मुँह से ’हे राम’ निकलता है। श्रीराम से प्रभावित तथा समानता के समर्थक अनेक लोग अपने नाम में श्रीराम का नाम जोड़ लेते हैं। हिन्दू समाज में आज भी वस्तुओं के बटवारे में कभी एक, दो, तीन नहीं होता बल्कि प्रथम स्थान पर ’राम है राम’ तथा क्रमशः दो, तीन का प्रयोग किया जाता है। यह गिनती नहीं है बल्कि दुःख है जो यह दिखलाता है कि श्रीराम के न होने से ही ऐसा करना पड़ रहा है। ऐसे तमाम उद्धरण हैं जो श्रीराम के द्वारा स्थापित रामराज्य का स्मरण दिलाते हैं। श्रीराम तथा उनके आदर्श लोगो के हृदय में आज भी हैं। एक बड़ा वर्ग आज भी श्रीराम के मार्ग पर चलने की कामना करता है। अतः राम नाम सत्य है!


डा0 रवि शंकर
पोस्ट डॉक्टोरल फेलो
प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवम् पुरातत्त्व विभाग,
 काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी।
Email-ravishankarupbhu@gmail.com