ऊर्जा के कई आयाम होते हैं उसमें मनुष्य की रचनात्मकता एक महत्वपूर्ण और जरूरी आयाम है।  प्रकृति जहाँ स्वयं रचनात्मक है वहीं उसने मनुष्य में भी रचनात्मकता का गुण विकसित किया है। रचनात्मकता मनुष्य का अनिवार्य गुण है। रचनात्मकता के माध्यम से ही समाज का उत्तरोत्तर विकास होता है और एक सौहार्दपूर्ण सामाजिक वातावरण का निर्माण भी। मनुष्य की मानसिक रचनात्मकता को सदैव एक मंच की आवश्यकता रहती है। छापाखाना के आविष्कार या विविध तकनीकी के विकास के पूर्व  भी मनुष्य ने अपनी रचनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए अनेक मंचों का प्रयोग किया है। आज रचनात्मकता के अनेक मंच उपलब्ध हैं और अभिव्यक्ति अनेक अवसर भी। उसी दिशा में नवचेतना त्रैमासिक पत्रिका भी एक छोटा सा प्रयास है जिसके माध्यम से अनसुनी आवाज़ों को स्वर देने का प्रयास किया जा रहा है।

पिछले डिजिटल अंक को देश के विभिन्न हिस्सों से सराहना मिली और जरूरी सुझाव भी मिले। और आशावादी प्रतिक्रियाओं से हमें भरोसा भी मिला की इस नन्ही सी पौध को सामूहिक प्रयासों से सिंचित कर वटवृक्ष में तब्दील किया जा सकता है। अकादमिक व्यस्तताओं की वजह से  यह अंक एक माह विलंब से प्रकाशित हो पा रहा है जिसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं। मैं ज्यादा कुछ ना कह कर इस डिजिटल अंक  को आपके हाथ में सौंप रहा हूं। आप भावना और तर्क की कसौटी पर इसे परखिए और अकुंठ भाव से अपनी प्रतिक्रियाओं से हमें अवगत कराइए।

सादर।