अब नहीं कोई बात ख़तरे की

अब सभी को सभी से ख़तरा है

एक सर्जक अपनी मन की आँखों से वह समय भी देख लेता है, जो आने वाला है। 'हम कौन थे क्या हो गए और क्या होंगे अभी' इन तीनों सवालों को अपने पाठक(समाज) के बीच रखता है। 

वैश्विक महामारी 'कोविड-19' के चुनौतीपूर्ण समय में जॉन एलिया अपनी पँक्तियों के साथ मुझे याद आते रहे। 'सभी को सभी से खतरा है' वाली बात उनकी दूरदर्शिता का ही प्रमाण है। यह पंक्तियाँ सिर्फ़ कवि-सम्मेलनों और मुशायरों में 'ताली', 'वाह...वाह' और 'इरशाद' के लिए नहीं रची गयी हैं, बल्कि इसके पीछे एक सजग रचनाकार की 'जीवनदृष्टि' है। जिस दृष्टि ने बहुत पहले ही इसकी ओर संकेत कर दिया था कि 'सेनेटाइजर युग' अब दूर नहीं है।

मुबारक़ हो! विकास की यात्रा में हम सभी इस पड़ाव तक पहुँच गए हैं। सबने खूब परिश्रम किया है। बधाई के हक़दार हम सभी हैं।

एक 'वायरस' ने हमारी 'औकात' और 'बहुत...ऊपर तक पहुँच' वाली थ्योरी को फेल कर दिया है। हम सब अपने घरों में कैद थे। सामान्य-जीवन को विवश थे। खूब गालियाँ भी पड़ीं कोरोना को। 'गो कोरोना गो' कहकर अपना प्रतिरोध व्यक्त किया। 

मैंने इस पूरे समय को बहुत करीब से देखा और महसूसा है। ढ़ेरों सवाल मन में उपजे। कुछ बातें भी स्पष्ट हो गयीं। घड़ी की सूई के साथ भागने वाली मेरी पीढ़ी बहुत ही 'व्यस्त' है। उसके पास समय की कमी है। जीवन में बहुत कुछ हासिल करना है जिसके लिए वह दिन-रात परिश्रम में लीन है। विकास की इस रेस हम में कदम से कदम मिलाकर चलते ही नहीं बल्कि भागते रहे लेकिन बहुत कुछ पीछे छोड़ दिया हमनें। 

गांव, घर, बुजुर्ग, लोक-कलाएँ यह सब कुछ ख़ारिज होता रहा। हम 'अपडेटेड' लोगों ने अपने घर-परिवार के बड़े-बुजुर्गों को 'आउटडेटेड' कहकर उनकी चेतना ही मार दी। रिश्ते भी क्या पुराने और छोड़ दिए जाने योग्य होते हैं?

 'घर कब आ रहे हो/रही हो' वाला प्यार हम नकारते रहे क्योंकि हमारे पास समय ही नहीं था। 'मुन्नवर राणा' याद आते हैं-


"दामन में कभी उसके बद्दुआ नहीं होती

एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है

माँ जब खफ़ा होती है तो बस रो देती है।"


कितना रुलाया है हमनें रिश्तों को लेकिन इस 'कोरोनाकाल' ने बता दिया कि आगे बढ़ने की चाह में सब छोड़ना जरूरी नहीं है। रिश्तों को सहेज कर रखना है। सब टूटा ही क्यों न हो...


मैं

रथ का टूटा हुआ पहिया हूं

लेकिन मुझे फेंको मत!

 (धर्मवीर भारती)


अंधेरे का सामना करने के लिए हर रोज 'उगना' पड़ता है। प्रकृति से यही संदेश मिलता है हमें। हर रोज उगता सूरज इस बात का प्रमाण है कि जीवन में 'तपना' भी पड़ता है। कितना कुछ हम इस प्रकृति से 'फ्री' में लेते हैं। कोई 'EMI' नहीं कोई 'लोन' नहीं। लेकिन हम इसके 'यूज टू' हो गए। धड़ल्ले से सबकुछ नष्ट करते जा रहे हैं। बिजली,पानी बेवज़ह का बरबाद कर देना  आधुनिकता का सूचक है क्या?

एक बार ठहर कर सोचना ज़रूरी है कि हम क्या कर रहे हैं...आने वाली पीढ़ी को क्या दे रहे हैं। नहीं सोचेंगे तो ऐसी चुनौती का सामना करना ही होगा और फिर 'मंज़र भोपाली' को यह लिखना पड़ेगा कि,

"जमीनें तंग होती जा रही हैं नस्ल है इंसा

मकां मिलते हैं अब शहरों पर आँगन नहीं मिलता।"


बदलते समय के साथ हमनें अपनी प्राथमिकताएं भी बदली हैं। इसके पीछे कहीं न कहीं 'हड़बड़ी' का संकेत है। 'इंटरनेट युग' का कब्जा चहुं ओर है। समय के साथ यह हमारी आवश्यक आवश्यकता के रूप में है और इससे कोई विरोध भी नहीं लेकिन एक बार खुद से कुछ बातें पूछना बहुत ज़रूरी है। जीवन के रंगों से सजी किताबें पीछे क्यों छूट गयी हैं?

जो किताबें हमारी चेतना का हिस्सा हुआ करती थीं, जिन पन्नों पर हम अपनी सहमति/असहमति के निशान लगाते थे, पन्नों को रंगते थे, यह सबकुछ कहीं दूर छूट ही तो गया है। लेकिन इस समय ने एक बार फिर किताबों से हमें जोड़ा है। किताबों के साथ जीना, उन्हें महसूसना एक अलग अनुभूति है जिसका कभी भी कोई और विकल्प हो ही नहीं सकता। हमारे बिना किताबें भी 'उदास' जीती हैं-

"किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से 

बड़ी हसरत से तकती हैं 

महीनों अब मुलाकातें नहीं होती 

जो शामें इनकी सोहबतों में कटा करती थीं,

अब अक्सर 

गुज़र जाती हैं 'कम्प्यूटर' के पर्दों पर 

बड़ी बेचैन रहती हैं किताबें..."

(गुलज़ार)


सही मायने में यह 'आत्ममूल्यांकन' का समय है। सहज और सजग होने का समय है। निश्चित रूप से इस विपदा ने अपनी ज़द में कई जिंदगियों को उजाड़ दिया। सवालों, भय के साथ जीना भी पड़ रहा है। लेकिन जीवन में कुछ भी 'अंतिम' नहीं है। उत्थान के बाद पतन, विनाश के बाद विकास का क्रम चलता ही रहता है। 'चार्ली चैप्लिन' ने इसी ओर इशारा किया है कि, 'इस अजीबोगरीब दुनिया में कोई चीज स्थायी नहीं है। हमारी मुश्किलें और मुसीबतें भी नहीं।'


अतः आगे बढ़ना ही हमारा लक्ष्य है। 'एकला चलो रे' की धारा में हमें अवगाहन करना ही है। यह समय भी बीतेगा। नया सूरज फिर से उगेगा क्योंकि, 

'अंधेरी रात के पर्दे में दिन की रौशनी भी है।'

अतीत से 'सबक' लेने की ज़रूरत है। वर्तमान का सही 'मूल्यांकन' भी करना होगा। और आने वाली सुबह का खुले मन और खुली बांहों से स्वागत भी हमें ही करना है। 

इस मुश्किल समय में हमारी सरकार ने बहुत से सकारात्मक कार्यों को अंजाम दिया है। 'मनोबल' को टूटने से बचाया है। हम सबने मिल कर इस चुनौती का सामना किया है(कर भी रहें हैं)। ऐसे ही एकजुट होकर सबके साथ, सबके लिए जीना होगा और कुछ रचना होगा।


जीवन ने सबके हिस्से बहुत कुछ दिया है। सबको सींचना भी है...खुद को भरना भी है। एक कदम भी पीछे नहीं हटना है। 'होने' के लिए चलना  ही है। अपने साथ सबके होने को स्वीकारना भी है।

 'सार्त्र' के शब्दों में कहें तो,

"मैंने यह कभी नहीं सोचा कि मैं विशिष्ट योग्यता का व्यक्ति हूँ, मेरी प्रमुख चिंता कार्य और विश्वास द्वारा केवल अपने को बचाये रखने की रही है। मेरे हाथ में कुछ न हो, मेरे मन के भीतर कुछ न रहे। परिणामस्वरूप मेरी इच्छा किसी के ऊपर होने की नहीं रही है। बिना किसी साधन, बिना किसी सहायता मैंने अपनी पूरी शक्ति अपने पूर्ण निजत्व को बचाने हेतु कार्य में लगायी। यदि मैं असंभव युक्ति का बहिष्कार कर दूँ तो केवल यही बचे कि यह एक पूरा आदमी था- सभी आदमियों की तरह, उन्हीं की तरह भला और किसी से अच्छा नहीं।"


यह समय मेरे लिए 'लौटने' का समय था। 'जुड़ने' का समय था...'आत्म' से संवाद का समय था। और सबसे जरूरी 'आत्ममूल्यांकन' का समय था। इस कठिन समय के साथ जीना मुश्किल था लेकिन,

"ज़िन्दगीं में आपके साथ जो हो रहा है, ये मायने नहीं रखता। बल्कि मायने ये रखता है कि आपको क्या याद है और किस तरह से याद है।"(गैब्रियल गार्सिया मार्केज)

सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने का...जीने का सबक इस समय ने दिया है। 'यकीन' के साथ इस 'फील्ड ऑफ बैटल' में कुछ प्रेम के रंग भर सकूं, यही इस समय की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी...

"यकीन हो तो कोई रास्ता निकलता है

हवा की ओट भी लेकर चिराग़ जलता है"              

-रश्मि सिंह ( शोधार्थी )