वसंत महिला महाविद्यालय,राज घाट, वाराणसी तथा महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,वर्धा के संयुक्त तत्वावधान में  पंडित मदन मोहन मालवीय राष्ट्रिय शिक्षक  एवं शिक्षण मिशन, मानव संसाधन विकास मंत्रालय,भारत सरकार के अंतर्गत द्वि साप्ताहिक  कार्यशाला का आयोजन किया जा रहा है।इस कार्यशाला के आयोजन का उद्देश्य शिक्षक ,शोध छात्र एवं विद्यार्थियों के मध्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुपालन की कार्य पद्धति को विकसित करने के साथ आनुषंगिक विषय से सम्बंधित रचनात्मकता को आधार प्रदान करना है।

 राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 आत्मनिर्भर भारत एवं विश्वगुरु के रूप में भारत तत्व की  शिक्षापद्धति का प्रगतिशील प्रयास है।  भारत की बहुभाषिक शक्ति को राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से समझने और प्रकारांतर से लागू करने का प्रयास किया गया है। मातृभाषा में शिक्षा जहाँ बालकों को अनावश्यक दबाव से मुक्त करती है वहीं उनकी सृजनात्मकता को कई आयामों में विकसित करती है।भारत के भाव तत्व को समझने के लिए मातृभाषा शिक्षण को राष्ट्रीय शिक्षा नीति में आवश्यक समझा गया है।

भाषा शिक्षण के विभिन्न टूल के माध्यम से सिद्धान्त को प्रयोग के रूप में परिणत करने की आवश्यकता है ।इस नीति ने अनुवाद  के द्वार को खोला है।जिसके माध्यम से सांस्कृतिक समझ और क्षेत्रीय आवश्यकता  के साथ लक्ष्य भाषा की शैली को समझना होगा।राष्ट्रीय शिक्षा नीति के भाषाई चिंतन ने भाषा के साथ साहित्य के संरक्षण पर भी बल दिया है।

भूमंडलीकरण के आवेग में हम अपनी मातृभाषा को भूलते हुए सांस्कृतिक समझ और क्षेत्रीय आवश्यकता के साथ स्थानीय समझ को भी भूलते जा रहे थे।राष्ट्रीय शिक्षा नीति ने एक ऐसे परिप्रेक्ष्य की  परिकल्पना की है जिसमें हम स्थानीय समझ को समझने का प्रयास कर सकें।

स्कूली शिक्षा के माध्यम से मातृभाषा शिक्षण पर बल ने पाठ्यक्रम निर्माण की दिशा में भी बदलाव के संकेत दिए हैं।इस बदलाव में हमें अन्तरक्षेत्रीय सांस्कृतिक समझ को भी विकसित करना होगा।विश्वभाषा,राष्ट्रभाषा,राजभाषा, क्षेत्रीय भाषा,मातृभाषा के साथ तकनिकी भाषा के मध्य  सामंजस्य बैठाना चुनौती है।कला विषयक और विज्ञान विषयक ज्ञान के मध्य तालमेल बैठाने के लिए लिबरल आर्ट विषय की परिकल्पना कहाँ तक सहयोग प्रदान कर सकती हैं और यह सेतु का कार्य कैसे कर सकेगा इस बारे में चिंतन अपरिहार्य है।

भाषा एवं साहित्य शिक्षण हेतु गुणवत्ता की शर्तों के अनुपालन के साथ रचनात्मक लेखन की दिशा में प्रयास को विस्तारित करने की आवश्यकता है।तुलनात्मक भाषा एवं साहित्य चिंतन के साथ भाषा भूगोल के अध्ययन को हमें प्रोत्साहन देना होगा।

विभिन्न काल तथा परिप्रेक्ष्य में साहित्य के आयाम को पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने के साथ ही शिक्षण की पद्धति का विकास राष्ट्रीय शिक्षा नीति के बहुआयामी विषय हैं जिसपर हमें विचार करना होगा।

साहित्यिक विमर्शों के बाज़ार ने अपने अपने मायने को तय कर रखा है और ऐसे वादों के घेरे में हम यथार्थ को कैसे समझ सकेंगे यह जानना भी आवश्यक है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषा और साहित्य शिक्षण के आयाम को आमूलचूल रूप से परिवर्तित कर भारतीय शास्त्र,लोक,अस्मिता तथा यथार्थ को समझने का प्रयत्न कर रही है।इस दिशा में चिंतन मनन हेतु द्वि साप्ताहिक अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया है।

पुस्तकालय की जीवंतता,रंगमंचीय गतिविधि,समूह में पठन पाठन और लेखन,कहानी,उपन्यास, त्रिभाषा फार्मूला,संस्कृत भाषा,विदेशी भाषा,प्राकृत भाषा,कोश निर्माण,लुप्त भाषाओँ को पुनर्जीवन,संस्कृत भाषाओँ की व्यावसायिक शिक्षा,पाण्डुलिपि संरक्षण,शास्त्रीय भाषाओं के संस्थानों और विश्वविद्यालयों का विस्तार,विभिन्न भाषाओं की अकादमी,नवीन अवधारणाओं के शब्द भंडार विकसित करने के साथ भाषा,कला,संस्कृति के विकास और चिंतन को विश्वविद्यालयीन स्तर पर लाने और आत्मसात करने का परिप्रेक्ष्य  इस कार्यशाला के अवधान का विषय होगा।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी और भारतीय भाषाओं पर कार्य करने वाले विद्वानों का सान्निध्य प्राप्त कर हम राष्ट्रीय शिक्षा नीति के भाषिक एवं साहित्यिक आयाम को समझ सकेंगे।