विविधता में एकता की बात करनेवाले हमारे देश में, एकता नाम मात्र रह गई है। आज हर इन्सान अपना इंसानियत का धर्म भूलकर जातिवाद में डूब गया है। जात पात, ऊंच नीच और धर्म के नाम पर आडंबरों को ज्यादा फैलाया जा रहा है। और आज हर कोई, अन्धविश्वास के कूएं में अपने आपको डूबो रहा हैं।


            आज इंसान धर्म, जात पात, ऊंच नीच में अपने आपको बांट रहा है। इसके साथ उसने भगवान को भी बांटना शुरू कर दिया है। जबकि ईश्वर पर हम सबका अधिकार है। फ़िर क्यों सदियों से निचले वर्ग के लोगों पर अत्याचार किए जाते थे। आज भी हो रहें है। उनका मंदिर में प्रवेश करना वर्जित किया गया था। पर उच्च वर्ग के चंद लोगों के घटियापन से पूरी जाती को क्यों कोसा जाता हैं।"करे कोई भरे कोई"ऐसी हालत आज हमारे देश की,समाज की हो गई है।


            कुछ लोगों ने हमसे पूछा भगवान को तुम मानती हो? क्या है भगवान, कौन हैं भगवान? आज कुछ लोग इतना बौखला गए है कि, भगवान को मानते तो नहीं, पर दूसरों की आस्था, विश्वास पर सवाल उठाते हैं। जो कि गलत है। क्यूंकि दुनियां में बहुत से लोग ऐसे हैं, जो भगवान को मानते है और कुछ लोग नहीं मानते। यह तो उनकी उनकी सोच है। तो ज़रूरी यह है कि, हम धर्म के नाम पर हो रहे आडंबरों को, दकियानूसी संस्कारों को जड़ से उखाड़ कर फेंक दें।


             पर आज इंसानों ने आस्था को, ईश्वर के स्वरूप को बदल डाला है।आज लोग अन्धविश्वास में डूबकर, ढोंगी बाबाओं के चक्कर में अपना सबकुछ लुटा रहा हैं। जबकि ऐसी घाटियां सोच, समाज को, देश को खोखला बना रहीं हैं। आज इस वैज्ञानिक युग में भी लोग शकुन अपशकुन जैसी बातों पर विश्वास करते हैं।जबकि इन सारी बातों का कोई ठोस आधार नहीं है। फ़िर भी यह अन्धविश्वास क्यों? इसी अन्धविश्वास के चलते आज लोग ना जाने कितने गलत कामों को अंजाम दे रहे हैं। आज इस अन्धविश्वास ने,जात पात की ज्वाला ने,स्त्री के प्रति समाज की सोच ने, पूरे देश को घेर लिया है। इसके घेरे से बाहर निकलना, अब बहुत ज़रूरी हो गया है। बात यहां सोचने की, समझाने की नहीं है। बल्कि खुद समझने की है। जब तक आप खुद अपने आप बात को नहीं समझ सकते, तब तक आप इस अन्धविश्वास से बाहर कभी नहीं निकल सकते। ऐसे में फ़िर कैसे होगा देश का विकास...?


               "जात पात, धर्म के नाम पर हो रहे आंडंबर, परंपरा के नाम पर घाटियां रीति रिवाज, देश को प्रगति पथ पर नहीं, बल्कि विनाश की तरफ़ ले जा रहें है। जरूरी है आज हर इन्सान को अपनी सोच बदलनी होगी। चाहे तुम किसी भी धर्म, जात के हो।पहले एक दूसरे को प्रेमभाव से, आदर भाव से और अपनेपन के भाव से तो देखना शुरू करो.... फ़िर देखना कितना बदलाव आएगा.....।"


                  "ना मैं किसी धर्म की हूं, ना मैं किसी जाति की। ना मैं किसी राज्य की हूं, ना मैं किसी गांव की हूं। ना मैं अमीर हूं, ना मैं गरीब हूं, मैं तो इस देश की बेटी हूं। हर एक की तरह मैं भी इस धरती पर जन्मी एक साधारण सी इन्सान हूं। दूसरों के प्रति, निस्वार्थ सेवा भाव को, अच्छे कर्मों को, अच्छे विचारों को ईश्वर मानती हूं। ना मैं किसी के विश्वास पर सवाल खड़ा करती हूं ना मैं किसी की आस्था पर अंकुश लगाती हूं। बस समाज में जो गन्दगी फ़ैल गई है, उससे सबको अवगत कराने का छोटा सा प्रयास करती हूं।अपनी लेखनी से,अपनी कलम की ताकत से..।"

                 


 डॉ. सपना दलवी (कर्नाटक)